साल 2015 अपनी आख़री सांसें ले रहा है। जौनपुरवासी बड़ी उम्मीद लगाय हैं कि उन्हें न ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव निराश करेंगे और न ही वर्ष 2015. दर असल अभी कुछ दिन पहले जनपद में एक वैवाहिक कार्यक्रम मे शिरकत करने आये सूबे के वज़ीरे आला अखिलेश यादव ने जनपद वासियों को बी श्रेणी का तोहफा दिये जाने का वादा किया था। तब से ज़िले के लोगों में आशा की किरण जगी है की विभिन्न नागरिक सुविधाओं के साथ-साथ विद्युत आपूर्ति में सुधार होगा। सरकारी कर्मचारियों को मकान किराये भत्ते में इज़ाफ़े को लेकर भी उत्साह है। जनपद के वरिष्ठ काबीना मंत्री सहित कई बड़े नेताओं ने आश्वासन और विश्वाश दिलाया है। अब देखना ये है की मुख्यममंत्री ज़िले के लोगों को साल ख़त्म होने के पहले नए साल के मौके पर ये तोहफा देते हैं या फिर ये मानके चले की हम तेरे होंगे ज़रूर ये वादा रहा।
Monday, 21 December 2015
Sunday, 20 December 2015
ख़त्म हुआ माहे-अज़ा हाय हुसैन अलविदा की गूंजी सदा।
यूं तो हज़रत इमाम हुसैन के चाहने वाले पूरे साल ग़म मनाते हैं। पर इस्लामिक कैलेंडर के माहे मुहर्रम की पहली तारीख़ से लेकर माहे रबि अव्वल की 8 तारिख तक यानि कुल दो महीना 8 दिन पूरी शिद्दत के साथ इमाम हुसैन का ग़म मानते हैं। इस दौरान शिया मुसलमानो के यहाँ शादी-ब्याह बर्थ-डे जैसे किसी भी ख़ुशी के कार्यक्रम की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं लाल गुलाबी कपड़ों से भी दूर सिर्फ काले कपडे पहनते हैं। आज के इस आधुनिक युग में भी ये क़ौम दो महीना ख़ुशी और उसके कार्यक्रम से कोसों दूर रहती है। यहाँ तक की महिलाएं अपनी चूड़ियाँ तोड़ देती हैं और साज-श्रृंगार से बाक़ायदा दूरी रहती है। इतनी कठिन तपस्या की आख़िर वजह क्या है। अब से 1400 साल पहले हज़रत मुहम्मद साहब (स0) इस दुनिया से रुख़सत हो चुके थे उनके नवासे(नाती) हज़रत इमाम हुसैन उस वक़्त के इमाम थे। उस वक़्त हुकूमत और राजपाट पर यज़ीद क़ाबिज़ था। जिसे आप आज के लादेन और बग़दादी का पूर्वज समझिये। जो दिखने में मुस्लमान का चोला पहने था लेकिन आतंकवादी और ज़ालिम था। उसने इमाम से कहा आप मेरी बैयत(समर्थन) कर दो। ये मुमकिन नहीं था इमाम ने इंकार किया उसने जंग की चुनौती दी। और कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की जिसमे हज़रत मुहम्मद (स0) के घराने के लोगों की काफी संख्या थी को तीन दिन का भूख प्यासा रखकर शहीद कर दिया जिसमे 6 माह का बच्चा भी था। शहीदों के लाशों को दफन भी नहीं करने दिया। ख़ैमों(कैम्पों) में आग लगा दी। और बचे हुये लोगों पर महीनो लगातार ज़ुल्म किया। हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने क़ुरबानी दी शहादत दी भूखे प्यासे रहे कष्ट सहा पर हक़ न्याय इंसानियत का साथ नहीं छोड़ा न ही ज़ुल्म और आतंकवाद के सामने घुटना टेका। इस्लाम और आतंकवाद को समझने के लिए इससे बेहतर मिसाल नहीं हो सकती। वर्तमान में जितने भी आतंकवादी संगठन हैं सब उसी यज़ीद आतंकवादी के वंशज हैं। इसी लिये हुसैनी हर साल पूरे मनोयोग से कर्बला की याद में ग़म मानते हैं ताकि हक़ इंसानियत मज़लुमियत न्याय सब्र बाक़ी रहे और ज़ालिम आतंकवादी बेनक़ाब होते रहें। असली इस्लाम पहचाना जाय। इसिलिय पूरी दुनिया में इमाम हुसैन के चाहने वालों की मस्जिदें इमामबाड़े और ज़िंदगियाँ इनके निशाने पर हैं। पर हुसैन वाले डरने वाले नहीं हर दौर में शहीद होते रहेंगे मगर हक़ न्याय इंसानियत और सच्चे इस्लाम के साथ रहेंगे। ज़िक्रे हुसैन करते रहेंगे और हर दौर के आतंकवाद पर लानत भेजते रहेंगे खुलकर जमकर आतंकवाद का विरोध करते रहेंगे। और आतंकवाद को बेनक़ाब करते रहेंगे ।
हज़रत इमाम हुसैन को इस मुल्क से बड़ी मुहब्बत थी। और यहाँ गमें हुसैन मनाने पर कोई पाबन्दी नहीं जबकि कई इस्लामी मुल्कों में है। जो हुसैनी फ़िक्र है वही इस्लाम की मूल आत्मा है। या हुसैन जय हिन्द।
हज़रत इमाम हुसैन को इस मुल्क से बड़ी मुहब्बत थी। और यहाँ गमें हुसैन मनाने पर कोई पाबन्दी नहीं जबकि कई इस्लामी मुल्कों में है। जो हुसैनी फ़िक्र है वही इस्लाम की मूल आत्मा है। या हुसैन जय हिन्द।
Thursday, 17 December 2015
प्रकृति सदैव न्याय करती है। पेंशनर्स दिवस पर बोले सी.डी.ओ.प्रकाश चंद श्रीवास्तव।
जौनपुर।पेंशनर्स से खचाखच भरे कलेक्ट्रेट सभागार में पेंशनर्स दिवस समारोह के अवसर पर बोलते हुये मुख्य विकास अधिकारी प्रकाश चंद श्रीवास्तव ने कहा की प्रकृति हमेशा न्याय करती है। वहाँ सब का लेखा जोखा है।वो क्रेडिट-डेबिट हिसाब से करती है।श्री प्रकाश का कहना था हम जो चाहते हैं ज़रूर कर लेते हैं अहम् बात ये है की हम कार्य के प्रति कितने सवेंदनशील हैं।उन्होंने पेंशनर्स की सारी समस्याओं को गंभीरता पूर्वक संज्ञान में लेते हुये हर महीने के गुरुवार को विकास भवन में पेंशनर्स दिवस मनाने की बात कही।और समस्त कार्यालय अध्यक्ष से भी ऐसी अपेक्षा की। श्री श्रीवास्तव ने पेंशनर्स के मेडिकल रिम्बर्समेंट समय से निस्तारित करने की भी अधिकारीयों से अपेक्षा की।सी.डी.ओ. महोदय ने इस बात पर बल दिया की हमें हमेशा ये ध्यान रखना चाहिये की कल सभी अधिकारी-कर्मचारी को भी पेंशन लेनी है। जो दूसरों को परेशान करेगा वो खुद भी परेशां होगा। हर माह की पहली तारिख को पेंशन दिलाने और सारे मामले समय से निबटाने के लिये पेंशनर्स ने मुख्य कोषाधिकारी राकेश सिंह की प्रशंसा की।इस अवसर पर तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशनर्स को सम्मानित भी किया गया।उपस्थित समस्त पेंशनर्स प्रतिनिधियों के उठाये गए बिन्दुओ का जवाब भी दिया और भविष्य में सहयोग और कार्यवाही का भरोसा भी दिया।सैकड़ों की संख्या में उपस्थित पेंशनर्स अधिकारी कर्मचारियों के लिए मुख्य कोषाधिकारी की तरफ से जलपान का बेहतर इंतेज़ाम किया गया था। कार्यक्रम सफल था पेंशनर्स सी डी ओ तथा वरिष्ठ कोषाधिकारी राकेश सिंह से शत प्रतिशत संतुष्ट दिखे।इस अवसर पर विभिन्न विभागों के अधिकारी प्रतिनिधि सहित कोषागार कर्मी मौजूद रहे।जिनमे प्रमुख रूप से चकबंदी कर्मी तनवीर अब्बास शास्त्री सहित कोषागार कर्मी शैलेन्द्र यादव,माता प्रसाद,दयाराम गुप्ता,मनोज,विमलेश भी उपस्थित रहे।अंत में मुख्य विकास अधिकारी प्रकाश चंद श्रीवास्तव,वरिष्ठ कोषाधिकारी राकेश सिंह तथा पुलिस अधीक्षक ग्रामीण ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया।
Wednesday, 16 December 2015
टाकीज़-सुनहरे और बदलते वक़्त की दिलचस्प दास्ताँ।
बस यूं ही बैठे-बैठे ज़ेहन ने गुज़रे दौर का सफ़र तय किया।जब टाकीज़ और फिल्मों का ज़माना था।फ़िल्में मनोरंजन का एकमात्र साधन और टाकीज़ उनके प्रदर्शन का एकमात्र स्थान । टाकीज़ के मालिक का शुमार शहर के रईस और बड़े लोगों में होता था।जो एक दो टाकीज़ का मालिक हो वो सांसद-विधायक को और जो चार-छः टाकीज़ का मालिक हो राजनैतिक दल को चंदा देता था।मालिक और प्रबंधक तो दूर अगर गेटकीपर भी पहचान कर सम्मान दे दे तो बड़ी बात होती थी।और अगर प्रबंधक विशेष् व्यवस्था में अलग से एंट्री देकर बैठा दे और जलपान भी करा दे तो वो आदमी ऐंठ कर चलता था।आज महानगरों में बमुश्किल तमाम 5 या6 मल्टीप्लेक्स/मॉल होंगे तब महानगरों में 40-50 टाकीज़ होते थे।दोपहर का शो छात्रो-नौजवानो का मैटिनी-इवनिंग शो फैमिली और मॉर्निंग-नाईट शो विशेष् वर्ग का होता था।पहले दिन पहला शो देखना ऐसे था मानो ग्रीनिज़् बुक में नाम लिख जायेगा।एडवांस बुकिंग लाइन का लगना टिकटों का ब्लैक होना। फिल्मों का सिल्वर गोल्डन प्लैटिनम जुबली होना पुरानी बात हुइ। वक़्त बदला दौर बदला टी .वी
.के रास्ते शुरू हुये सफ़र ने केबिल डिश कंप्यूटर इंटरनेट सी डी पेन- ड्राइव् की मंज़िल पाई। पर इस पूरे सफ़र में फिल्मों का वजूद तो बाक़ायदा बचा रहा लेकिन मल्टीमीडिया और आधुनिक मोबाइल के दौर में टाकीज़ के वजूद ने दम तोड़ा और इतिहास के पन्नों की ज़ीनत बन गया। जो टाकीज़ कभी लैंडमार्क होता था।अब उसकी बिल्डिंग में शॉपिंग मॉल गोदाम कोल्ड स्टोरेज आदि खुल गये। अमिताभ बच्चन की जिन फिल्मों को स्कूल छोड़कर पैसा चुराकर और बड़ी मशक्कत के साथ लोगों ने देखा था अब उन्ही फिल्मों को आसानी से डिश टीवी पर देखकर अजीब सी अनुभूति होती है।तो कुल मिलाकर टाकीज़ कभी जिसका मनोरंजन की दुनिया में अपना एक बड़ा मुक़ाम था अब इस दौर में अन्तिंम सांसें गिन रहा है। टाकीज़ का स्वर्णिम युग समाप्त हुआ।
.के रास्ते शुरू हुये सफ़र ने केबिल डिश कंप्यूटर इंटरनेट सी डी पेन- ड्राइव् की मंज़िल पाई। पर इस पूरे सफ़र में फिल्मों का वजूद तो बाक़ायदा बचा रहा लेकिन मल्टीमीडिया और आधुनिक मोबाइल के दौर में टाकीज़ के वजूद ने दम तोड़ा और इतिहास के पन्नों की ज़ीनत बन गया। जो टाकीज़ कभी लैंडमार्क होता था।अब उसकी बिल्डिंग में शॉपिंग मॉल गोदाम कोल्ड स्टोरेज आदि खुल गये। अमिताभ बच्चन की जिन फिल्मों को स्कूल छोड़कर पैसा चुराकर और बड़ी मशक्कत के साथ लोगों ने देखा था अब उन्ही फिल्मों को आसानी से डिश टीवी पर देखकर अजीब सी अनुभूति होती है।तो कुल मिलाकर टाकीज़ कभी जिसका मनोरंजन की दुनिया में अपना एक बड़ा मुक़ाम था अब इस दौर में अन्तिंम सांसें गिन रहा है। टाकीज़ का स्वर्णिम युग समाप्त हुआ।
Sunday, 13 December 2015
दुनिया भर में मशहूर रन्नो का जुलूस अमारी 14 दिसम्बर को।
जौनपुर। जनपद मुख्यालय से कोई 20-25 किलोमीटर दूर सुल्तानपुर रोड पर स्थित बख्शा ब्लाक के दक्खिनपट्टी रन्नो ग्राम की जुलूसे अमारी विश्वविख्यात है।यहाँ पूर्वांचल के समस्त ज़िलों सहित देश के कोने-कोने ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं।इस अमारी में पचास हज़ार से लेकर पचहत्तर हज़ार तक की तादाद में लोग शिरकत कर चुके हैं।10 बीघे में तो चार पहिया और दुपहिया वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था होती है। एक सुबह से सुल्तानपुर रोड पर जो काले लिबास में दुपहिया-चारपहिया वाहनों से अज़ादारो के आने का सिलसिला शुरू होता है वो कहीं रात में ही जाकर थमता है।हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में उनका ग़म मनाने या यूं कहें की आतंकवाद के विरुद्ध जमकर विरोध प्रदर्शन करने हुसैन के चाहने वालों की भारी तादाद के बीच सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक चलने वाले इस कार्यक्रम में आयोजकों की तरफ से न जाने कितने कुंतल खाने का इंतज़ाम होता है। इतना ही नहीं पूरे ग्राम में जगह-जगह घर-घर खाने-पीने का इफरात इंतेज़ाम होता है।सन् 2002 में मौलाना हसन अकबर ख़ान जो इस प्रोग्राम के मुख्य कर्ता धर्ता हैं ने अपने सहयोगियों के साथ इसे क़ायम किया था जो मात्र 14 साल के सफ़र में कामयाबी की मंज़िल तय कर चुका है।हमसे इस प्रोग्राम के बारे में बात करते हुये हसन अकबर साहब ने बताया कि इस साल दुनिया का सबसे ऊँचा 133 फिट काअलम उठाया जायेगा।देश दुनिया के जितने भी मशहूर खतीब नौहेख्वां है लगभग सभी यहाँ आ चुके हैं। कर्बला के मक़तल की मंज़र कशी के मंज़र का जवाब नहीं। इलाके भर के हर क़ौमों मिल्लत के लोग यहाँ ज़रूर आते हैं। क्योंकि जो भी हक़परसत है सत्यवादी है।न्यायप्रिय है। मज़लूम है वो हुसैनी है और जहाँ हुसैन हैं वहां आतंकवाद हो नहीं सकता जहाँ आतंकवाद वहां हुसैन नहीं हो सकते। बिना हुसैन के दीन इस्लाम की कल्पना भी नहीं हो सकती। जो हुसैनी फ़िक्र है वही हमारे मुल्क की मूल आत्मा है। हुसैन और हिंदुस्तान को कोई जुदा कर नहीं सकता या हुसैन जय हिन्द।
Saturday, 12 December 2015
चार बजे भोर में कलेक्ट्रेट से रवाना होगी मतगणना कर्मियों की बस।
जौनपुर।पंचायत निर्वाचन 2015 की मतगणना के लिए कर्मियों को लेकर सभी 21 ब्लाक के लिये 4 बजे भोर में कलेक्ट्रेट से रविवार 13 दिसम्बर को बसें रवाना होगी।हमसे बात करते हुये निर्वाचन यातायात से जुड़े अधिकारी राकेश बहादुर सिंह ने बताया की सारी तैयारी पूरी कर ली गयी है। बसों के लाइनअप करने और ब्लॉकवार इश्तेहार चस्पा करने का कार्य जारी है। श्री सिंह का कहना था कि हम अपनी तैयारी के अनुसार ठीक 4 बजे से बसों को रवाना करेंगे जिससे कर्मी समय से ब्लाक पहुंचे और मतगणना का कार्य समय से संपन्न हो सके।
Friday, 11 December 2015
सड़क पर बारात जाम की आफत जनता की सांसत।
आजकल शादियों का सीज़न है। शहर में जिधर भी निकलो सिर्फ बारात। फिर क्या गाजा-बाजा,डी.जे. वी.जे. गाड़ियों का लंबा क़ाफ़िला बीच सड़क पर बिंदास धूम-धड़ाका पूरे इत्मिनान के साथ डांस आतिश बाज़ी। दूसरी तरफ भीषण जाम। साइकिल-रिक्शा ऑटो और गाड़ियां एम्बुलेंस में मरीज़। पैदल बूढ़ा जवान मर्द औरत बुरी तरह हलाकान। कोई पुरसाने हाल नहीं।उनकी मर्ज़ी जब सड़क छोड़े। न कोई निज़ाम न व्यवस्था न क़ानून न कोई सुनने वाला। यहाँ सब चलता है। एडजस्ट करना पड़ता है। सो करो।
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