जौनपुर। शीराज़े-हिन्द जौनपुर बेशक अज़ादारी का मरकज़ है। न जाने कितने तारीख़ी जुलूस, इमामबारगाह, मजलिसों को ये अपने दामन में समेटे है। इसी सिलसिले का एक तारीख़ी और अपने किस्म का अनूठा जुलूस गोमती नदी के किनारे अली घाट पर अंजुमन सज्जादिया के ज़ेरे एहतेमाम पूरी शानो-शौकत के साथ मनाया जाता है 20 सफ़र को हज़रत इमाम हुसैन के चेहलुम के दिन जिसे दरिया के अलम के नाम से मक़बूलियत हासिल है। हज़ारों की तादाद में मर्दों, औरतों और मौजूदगी के बीच मजलिस को ख़िताब किया मौलाना महफूज़ खान साहब ने किया। पहली तक़रीर मौलाना हसन अकबर ने, दरमियानी रज़ी बिस्वानी और आख़री तक़रीर डॉ क़मर अब्बास ने किया। नेज़ामत असलम नक़वी साहब ने बख़ूबी किया। मेहँदी आब्दी और बाबू ने सभी ज़ायरीन का अंजुमन सज्जादिया की जानिब से इस्तेकबाल किया। ऐसा पुर कशिश मंज़र की कर्बला की याद ताज़ा हो जाय। बाद ख़त्म मजलिस ज़ुल्जना, अलम का दरिया में जाना हुसैनी जवानों का दरिया के बीचो-बीच मातम और फिर मातमी अंजुमन का दरिया से निकलते वक़्त मौला अब्बास का अलम और जनाबे सकीना के ताबूत का मिलना और हज़ारों की तादाद में मौजूद हुसैनियो के बीच रोने-पीटने का कोहराम बरपा होना। ऐसा मंज़र शायद पूरी दुनिया में कहीं हो। दरिया के पूरे एक हिस्से और अली घाट पर चारों तरफ बस या हुसैन, या हुसैन और हुसैनी मातम दारों का हुजूम। जिसने भी एक बार इस मंज़र को देखा वो कभी भूल नहीं सकता। इतना ही नहीं अंजुमन, तंजीमों और मोहल्ले वालों की तरफ से पानी, चाय की सबील खाने का इफरात इंतेज़ाम भी क़ाबिले ज़िक्र है।
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Monday, 21 November 2016
Thursday, 3 December 2015
दरिया किनारे प्यासों का मातम। उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
जौनपुर। आज इस्लामिक कैलेन्डर के माह सफ़र की 20 तारीख़ थी।इसी तारीख़ को हर साल आक़ा हुसैन के अज़ादार पूरी दुनिया में इमाम हुसैन का चेहलुम मनाते हैं।आज सुबह से ही लोग गोमती नदी के तट यांनी अली घाट पर इकठ्ठा होना शुरू हुये और देखते-देखते हर तरफ सिर्फ काले कपडे में हुसैन के अज़ादार और कुछ नहीं।सबसे पहले मौलाना महफ़ुज़ूल हसन खान ने मजलिस को खेताब किया। मौलाना हसन अकबर और रज़ी बिस्वानी ने जुलूस उठने के बाद तक़रीर की। दरिया किनारे पानी के अंदर हुसैन के अज़ादारो ने जब लबबैक या हुसैन की सदा बुलंद की और अलम ताबूत ज़ुल्जना को देखकर हर किसी को कर्बला के प्यासे शहीद याद आये और लोगों ने नम आँखों से अपने इमाम को याद किया।आज से 1400 सौ साल पहले तब के आतंकवादी यज़ीद और उसके साथियों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों का बेरहमी से क़त्ल किया। और आज उनके चाहने वाले उनकी याद में पानी की सबील चलाते हैं और लोगों कोखाना खिलाते हैं। तब हज़रत इमाम हुसैन ने क़ुर्बानी देकर आतंकवाद का सर कुचला और आज उनके चाहने वाले हुसैन का नाम लेकर आतंकवाद का विरोध कर रहे। भारी तादाद में मौजूद आक़ा के अज़ादारो के इस चेहलुम के प्रोग्राम का संचालन असलम नक़वी और मेहँदी आब्दी ने किया।



Sunday, 29 November 2015
इस्लाम और आतंकवाद में फर्क़ कैसे करें ?
ज़ोर-ज़बरदस्ती है। बेकसूरों का क़त्ल है।अल्लाह के घर मस्जिद और शहर-शहर बम के धमाके हैं दहशत है वो इस्लाम नहीं आतंकवाद है।यहाँ ये उल्लेखनीय है की जो खुलकर जमकर आतंकवाद का विरोध करे । चाहे मौत ही क्यों न आ जाय। ये हुसैनी किरदार और इस्लाम है। जो आतंकवादियों का खुलकर जमकर विरोध न करे उनके लिए हमदर्दी रखे सहयोग करे वो दिखने में मुसलमान जैसे हो पर वो दरअसल आतंकवादी हैं। इमामे हुसैन के चेहलुम के मौके पर पूरी दुनिया से दर्शनार्थी करोड़ों की तादाद में कर्बला पहुच चुके हैं। स्थानीय इमाम हुसैन के चाहने वाले दर्शनार्थियों की इतनी सेवा करते है। जो दुनिया के पैमाने पर मिसाल है। यही मानव सेवा इस्लाम है।जो पूरी दुनिया के लिए आतंक का कारण हैं वो निश्चिंत आतंकवादी ।जो फर्क़ हज़रत इमाम हुसैन और यज़ीद में है। वही इस्लाम और आतंकवाद में है।या हुसैन जय हिन्द । दरअसल हिंदुस्तान की मूल आत्मा हुसैनी और आतंकवाद की दुश्मन है। जिसपर हमें बेइंतेहा गर्व है।
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