आजकल पूरी दुनिया में ये चर्चा आम है की इस्लाम और आतंकवाद में, मुसलमान और आतंकवादियों में फ़र्क़ क्या है।और अक्सर लंबी चौड़ी बहस के बाद भी दुनिया भर का नेक सच्चा और असली मुसलमान सामने वाले को वो जवाब नहीं दे पाता जो बांग्लादेश के नौजवान फ़राज़ हुसैन ने दिया। फ़राज़ ने दुनिया को सन्देश दिया की मासूमों और मज़लूमों का बेगुनाहों का क़त्ल करने वाला मुसलमान हो ही नहीं सकता बल्कि मुसलमान वो है जो हक़ की ख़ातिर, इंसानियत की ख़ातिर, और दोस्ती की ख़ातिर हँसते-हँसते शहीद और क़ुर्बान हो जाये। बांग्लादेश की घटना में आतंकियों ने मासूमों का क़त्ल तो किया ही ,पर वो फराज़ को छोड़ कर इस्लाम को पूरी दुनिया में रुस्वा करना चाहते थे। लेकिन फ़राज़ ने ज़िल्लत की ज़िंदगी के मुक़ाबले इज़्ज़त की मौत को चुना और अपनी दोस्त तिरिषि जैन के लिए, दोस्ती के लिए, हक़ के लिए, इंसानियत के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी। क्योंकि फ़राज़ सिर्फ फ़राज़ नहीं बल्कि फ़राज़ हुसैन था। जी जहाँ हुसैन होंगे वहां आतंकवाद नहीं हो सकता और जहाँ आतंकवाद हो वहां हुसैन नहीं और जहाँ हुसैन नहीं वहां इस्लाम हो ही नहीं सकता। ख़्वाजा अजमेर चिश्ती बहुत पहले कह चुके कि हुसैन दीन हैं। आज से 1400 साल पहले यज़ीद और हज़रत इमाम हुसैन के बीच कर्बला में जंग हुयी। दोनों पक्ष नमाज़ पढ़ते थे, रोज़ा, अज़ान , दाढ़ी सब, पर यज़ीद आतंकी था उसने हज़रत इमाम हुसैन और उनको बेरहमी से क़त्ल किया तीन दिन का भूखा- प्यासा जो मुहम्मद साहब (स0) के नवासे और सर्वथा हक़ पर थे। कर्बला में जो हक़ के लिए शहीद हुये वो हुसैन थे मुसलमान थे और इस्लाम और इंसानियत के रक्षक जिन आतंकियों ने शहीद किया वो आज के आतंकियों की तरह ही मुसलमान का चोला पहने थे। और यज़ीद और आज के आतंकियों का आपस में वही रिश्ता है जो एक ज़ालिम का दूसरे ज़ालिम से पुश्तैनी ख़ूनी और ख़ानदानी रिश्ता होता है। पर एक अकेला फ़राज़ हुसैन उन बहुत से आतंकियों के मुँह पर कालिख़ पोत गया और इस्लाम और आतंकवाद के फ़र्क़ को समझा गया। सलाम है उस सच्चे मुसलमान फ़राज़ हुसैन को और सीरिया, इराक़, ईरान और कर्बला में आज भी हुसैनी होने के नाते आतंकियों से लड़कर शहीद हो रहे और उनके ज़ुल्म का शिकार भी। पर सच तो ये है की जब तक नामे हुसैन ज़िंदा है इस्लाम, इंसानियत और हक़ की ख़ातिर अकेले फ़राज़ जैसे लोग आतंक को बेनक़ाब और रुस्वा करते रहेंगे। चाहे उन्हें जान ही क्यों न क़ुर्बान करना पड़े। जो कोई खेल नहीं बल्कि हुसैनी जज़्बा है।
Tuesday, 5 July 2016
तहसील दिवस पर चकबंदी अधिकारी रहे सामूहिक अवकाश पर। बांधी काली पट्टी।
जौनपुर। अपनी मांगों के समर्थन में प्रादेशिक चकबंदी अधिकारी संघ के आवाहन पर जनपद शाखा के चकबंदी अधिकारी आज तहसील दिवस पर सामूहिक अवकाश पर रहे। उक्त आशय की जानकारी देते हुये हमको संघ के ज़िला महासचिव डॉ ब्रजेश पाठक ने बताया की सहायक चकबंदी अधिकारी का ग्रेड 4800- करने तथा उन्हें दिनाक 30-6-16 तक राजपत्रित अधिकारी का दर्जा न देने के कारण हम पहली जुलाई से काली पट्टी बांधकर कार्य कर रहे हैं। तहसील दिवसों पर सामूहिक अवकाश पर रहेंगे तथा डी ऍम के माध्यम से पत्रक मुख्यमंत्री को सौपेंगे। डॉ पाठक ने उत्तर प्रदेश शासन से मांगे पूरी करने की अपील की है। और विश्वाश जताया की शासन जल्द ही हमारी मांगों को पूरा करेगा। इस अवसर पर चकबंदी अधिकारी कामता प्रसाद, सहायक चकबंदी अधिकारी धर्मदेव सिंह यादव,राम तिलक वर्मा आदि मौजूद रहे।
Saturday, 2 July 2016
जुमले-बाज़ी का शिकार सातवां वेतन आयोग, 11 जुलाई से होगी महाहड़ताल ।
सातवां वेतन आयोग भी केंद्र सरकार की जुमले-बाज़ी का शिकार हो गया। कर्मचारी अपने-आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। जब जस की तस माह दिसम्बर में प्रस्तुत सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करनी थी तो फिर सचिवों की कमेटी बनाने और जानबूझकर महीनो टालने की ज़रुरत क्या थी। और तो और गज़ब का मीडिया मैनेजमेंट की विभिन्न समाचार पत्र, टीवी चैनल और वेबसाइड 29 जून तक ये ख़बर देते रहे की सरकार न्यूनतम वेतन 23500- या फिर 27000- स्वीकार करेगी साथ ही 2.9 से 3.4 तक की पे मैट्रिक्स देने जा रही है। पर जिस 7000 को 18000 का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वो चपरासी जनवरी 2016 की स्थिति के हिसाब से महज़ 2000- के फायदे में है और नयी बीमा स्कीम के हिसाब से तो उसकी टेक होम सैलेरी और कम हो जायेगी। कुल मिलाकर लगभग हर वेतनमान में उतना भी इज़ाफ़ा नहीं जितना एक कर्मचारी एक वर्ष में डी ए की दोनों किश्तें और वेतन वृद्धि से पाता था फिर इस जुमलेबाजी के आयोग के मायने क्या। बहरहाल 11 जुलाई से केंद्रीय कर्मचारी ऐतिहासिक और महाहड़ताल करने जा रहा है जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ भी पूरे दम-खम से भागीदारी करेगा। हमसे बात करते हुये महासंघ के पदाधिकारी अजय सिंह व अशोक सिंह का संयुक्त रूप से कहना था की कर्मचारी लामबंद है, पूरी तैयारी है। ऎसी हड़ताल न देखी गयी होगी और न सुनी गयी होगी। सरकार को अभी हमारी ताक़त और एकजुटता का एहसास नहीं है। 11 जुलाई से संघर्ष की नई इबारत लिखी जायेगी जो जीत का परचम लहरायेगी।
Tuesday, 28 June 2016
जौनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद ये गड्ढा दुर्घटना को है खुला आमंत्रण ।
जौनपुर। कलेक्ट्रेट परिसर के बीचो-बीच न्यायलय कक्ष संख्या 18 के ठीक दरवाज़े के बग़ल मौजूद ये गड्ढा दुर्घटना को खुला आमंत्रण है। अगर वहां से गुजरने वाले का ज़रा भी ध्यान हटे या फिर वो मोबाइल से बात करने लगे तो निश्चित दुर्घटना हो सकती है। छोटे बच्चे गिर सकते हैं और जानवर भी। जनहित में ज़िम्मेदार अधिकारियो से आम जनता की तरफ से गुज़ारिश है कि इस गड्ढे को बंद कराकर किसी भी दुर्घटना या फिर खतरे से आमजन को बचाएं।
Monday, 27 June 2016
समाजवादी पार्टी ने क्यों किया क़ौमी एकता दल के साथ धोखा ?
समाजवादी पार्टी ने क़ौमी एकता दल विलय में धोखा क्यों किया। इस सियासी ड्रामेबाज़ी का मतलब क्या है। ये जानबूझकर रची गयी साज़िश तो नहीं। एक तरफ पार्टी के चीफ मुलायम सिंह की सहमति और यू पी प्रभारी शिवपाल की मौजूदगी में बाक़ायदा विलय की घोषणा, प्रेस कॉन्फ्रेंस और फिर मुख्यमंत्री अखिलेश की नाराज़गी से लेकर बलराम यादव की बर्खास्तगी , संसदीय बोर्ड की बैठक और बलराम यादव की मंत्रिमंडल में वापसी के साथ इस पूरी साज़िश का अंत हुआ। जहाँ तक मुख़्तार अंसारी की अपराधिक छवि और अखिलेश की विकास के कार्य और बेहतर छवि लेकर चुनाव में जाने की बातें बताकर आँख में धूल झोंकी गयी। तो अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल से लेकर सपा के विधायक और पार्टी में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं जिनके ऊपर विभिन्न आपराधिक मुक़दमे दर्ज न हो और उनके नाम से उस जनपद के आस-पास के इलाके का आम आदमी ख़ौफ़ से कांपता न हो ज़ुल्म का शिकार न हो। रही बात मुख्यमंत्री की छवि की तो आने वाला समय बताएगा, न बिजली न पानी न सड़क न न्याय, बस एक जात विशेष् का दबदबा, हर तरफ भ्रस्टाचार, दलाली, कमीशनखोरी का बाज़ार गर्म है। वो अपने को नितीश कुमार समझते हैं तो अखिलेश की ग़लतफ़हमी है। नितीश को भी गठबंधन की ज़रूरत पड़ी थी। फिर ये धोखा क्यों? कहीं जानबूझकर ये क़ौमी एकता दल को कमज़ोर और रुसवा करने का प्रोग्राम तो नहीं था। पर अगर क़ौमी एकता दल अपनी इस शिकस्त को हथियार के रूप में इस्तेमाल करे तो पूरे पूर्वांचल में सपा का सफाया हो सकता है। वैसे भी मुसलमानो ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुये ये एहसास किया है की अंसारी बंधुओं और क़ौमी एकता दल के साथ ऐसा सिर्फ मुस्लमान होने के नाते और मुस्लिम विरोधी ताक़तों के इशारे पर हुआ है। अगर ये बात आम हो गयी तो समझो सपा साफ हो गयी।
Sunday, 26 June 2016
20 रमज़ान का 100 साल पुराना तारीख़ी जुलूस निकला। या अली या हुसैन की सदा गूंजी।
जौनपुर। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स0)के चचेरे भाई, दामाद, हज़रत इमाम हसन, हुसैन, मौला अब्बास और जनाबे ज़ैनब के पिता और शिया मुसलमानो के पहले इमाम हज़रत अली इब्ने अबू तालिब की शहादत की याद में मोहल्ला बलुआघाट के मददू की इमामबारगाह से सौ साल पुराना तारीख़ी जुलूस निकला। चिलचिलाती धूप, गर्मी के बावजूद भारी तादाद में मर्द, औरत और बच्चे रोज़ा रखे हुये जुलूस में शामिल हुये। लगभग तीन बजे दोपहर शुरू हुई इस मजलिस को ख़िताब करते हुये मौलाना क़ैसर अब्बास साहब ने बताया की चौदह सौ साल पहले सुबह की नमाज़ में मौला अली पर आतंकवादी इब्ने मुलजिम ने वार किया और मौला ज़हर में बुझे तीर से रोज़े की हालत में शहीद हुये। हज़रत अली के जैसा दुनिया में न शिक्षाविद् हुआ, न न्याय वादी हुआ और न ऐसा बहादुर और न ही ऐसा शासक। आपने अपने शासन काल में खुले मंच से पूछा की मेरे शासन कॉल क्या कोई भूखा सोया है। एक भी आवाज़ नहीं आयी। दुनिया की इब्तेदा से अब तक किसी शासक की ये हैसियत नहीं की वो अपनी जनता से खुले मंच पर ये दावा कर सके। उनकी वेलदात काबा में और शहादत मस्जिद में हुयी। मसाएब सुनकर लोग सर पीट-पीट कर रोये। मजलिस के बाद तुर्बत के साथ अलम उठाये अज़ादार चहरसू पहुंचे और वहां हुयी तक़रीर के बाद शाह के पंजे की इमामबारगाह की तरफ जुलूस रवाना हुआ। इस तारीख़ी इमामबारगाह में हज़ारों शिया मुसलमान अपने इमाम की ताजिये के दफनहोने के बाद रोज़ा इफ्तार करेंगे। इस आतंकवाद विरोधी जुलूस में असलम नक़वी, क़मर हसनैन दीपू, तनवीर अब्बास शास्त्री, रूमी, आज़म ज़ैदी , मुन्ना अकेला प्यारे भाई आदि मौजूद रहे।
Saturday, 25 June 2016
अंसारी बंधुओं को झटका, क़ौमी एकता दल का विलय सपा को क़ुबूल नहीं।
समाजवादी पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में हुआ फैसला। क़ौमी एकता दल का विलय नहीं होगा। सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने एक बयान में ये बात बताई। निश्चित रूप से मुलायम और शिवपाल पर अखिलेश भारी पड़े। क़ौमी एकता दल और अंसारी बंधुओं के लिए ये ख़बर चौकाने वाली और अच्छी नहीं है। उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य और इस विलय के क़दम दोनों पर विचार करना होगा। वहीँ दूसरी तरफ ये फैसला सपा के लिये भी अच्छा नहीं। सियासत में ऐसे गैर संजीदा फैसले नहीं लिए जाते के कभी हाँ तो कभी ना। ये फैसला 2017 के चुनाव में सपा को भारी भी पड़ सकता है। साथ ही ये तथ्य भी सामने आया की सपा में अंदर सबकुछ न बहुत ठीक और न ही सब एक जुट हैं। जब बार-बार फैसले बदले जाएँ तो आप की कमज़ोरी साफ नज़र आती है।
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